डोनाल्ड ट्रंप ने 180 देशों पर टैरिफ लगाने की घोषणा, भारत और चीन को बड़ा झटका

मेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में नई टैरिफ नीति की घोषणा कर दी है. जिसमें 180 देशों पर भारी शुल्क लगाने का फैसला किया गया. इनमें अमेरिका के कई सहयोगी देश भी शामिल हैं. ट्रंप ने भारत पर 27 फीसदी टैरिफ लगाया है. साथ ही चीन पर 34 प्रतिशत का टैरिफ लगाया गया है.
ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने दयालुता भरा रुख अपनाया है. क्योंकि उन्होंने अमेरिका पर लगाए जाने वाले टैरिफ का करीब आधा टैक्स ही लगाया है. ट्रंप ने इसे डिस्काउंटेड रेसिप्रोकल टैरिफ कहा है. मगर हैरानी का बात है कि रूस की इस टैरिफ लिस्ट से बाहर रखा गया है. सवाल उठता है कि आखिर रूस को यह छूट क्यों मिली?
रूस को क्यों मिली राहत?
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बताया कि रूस को इस सूची में इसलिए शामिल नहीं किया गया क्योंकि यूक्रेन युद्ध के कारण उस पर पहले से ही इतने कड़े प्रतिबंध लगे हैं कि अमेरिका और रूस के बीच व्यापार शून्य हो चुका है. इसके ठीक उलट युद्धग्रस्त यूक्रेन पर 10% अतिरिक्त शुल्क लगाया गया है. ट्रंप की इस नीति के तहत कई पूर्व सोवियत देशों को भी टैरिफ झेलना होगा, लेकिन रूस को छूट मिलने से कई विशेषज्ञ हैरान हैं.
क्या है टैरिफ नीति का मकसद?
रूस लंबे समय से पश्चिमी देशों की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को हटवाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि इनसे उसकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है. अमेरिका और यूरोपीय संघ ने 2022 से रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जिनमें ऊर्जा, बैंकिंग, रक्षा और तकनीकी क्षेत्रों को निशाना बनाया गया है.
ट्रंप प्रशासन के इस फैसले को लेकर अमेरिकी सांसदों ने भी प्रतिक्रिया दी है. अमेरिकी सीनेट में एक नया बिल पेश किया गया है, जिसमें रूस के खिलाफ और सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है. इस बिल का समर्थन रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों पार्टियों के 50 सीनेटर कर रहे हैं.
रूस के तेल खरीदारों पर भी पड़ेगा असर
ट्रंप ने यह भी ऐलान किया कि जो भी देश रूस से तेल खरीदेगा, उस पर अमेरिका 500% तक का टैरिफ लगाएगा. साथ ही, रूस को मिलने वाले आर्थिक समर्थन को रोकने के लिए “सेकेंडरी टैरिफ” भी लागू किया जाएगा.
अमेरिका ने अप्रैल 2022 के बाद से रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदा है. लेकिन रूस अब अन्य देशों के जरिए अपना व्यापार बढ़ा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की नई नीति रूस के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है और उसे यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए मजबूर कर सकती है.